खबरों का नहीं हो रहा असर, कलमकार की आवाज दबाने का प्रयास, आला अधिकारियों पर भारी पड़ रहे दो उपयंत्री

 उपयंत्री बता रहा पहुंच और पैसे की रौब, कर रहा ठेकेदारी


भोपाल/शहडोल (जनपद पंचायत जयसिंहनगर)।लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ और समाज का दर्पण कहा जाता है। लेकिन इन दिनों जनपद पंचायत जयसिंहनगर में भ्रष्टाचारियों द्वारा इस दर्पण पर पर्दा डालने की पुरजोर कोशिश की जा रही है। हालात यह हैं कि जमीनी हकीकत और भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले कलमकारों पर ही दबाव बनाया जा रहा है। अगर समाज को आईना दिखाने वाले चौथे स्तंभ को ही डराने-धमकाने का प्रयास किया जाएगा, तो लोकतंत्र का क्या होगा?

जहां उच्च अधिकारियों को भ्रष्टाचारियों पर लगाम कसनी चाहिए, वहीं इसके विपरीत आरोपियों को खुली छूट मिलती दिखाई दे रही है।

इन दिनों जयसिंहनगर जनपद के दो उपयंत्री (सब-इंजीनियर) मनोज शुक्ला और हिमेंद्र पटले लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं। उनके कार्यक्षेत्रों में हुए निर्माण कार्यों की जांच की मांग ने दोनों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ग्राम पंचायतों के विकास कार्यों में इन दोनों उपयंत्रियों की भूमिका किस तरह की रही है, यह किसी से छिपा नहीं है। इनके कारनामों पर अगर लिखा जाए तो पूरी किताब तैयार हो सकती है। अपने कार्यक्षेत्र में खुलेआम लापरवाही बरतने के बावजूद उच्च अधिकारियों का इन्हें मूक संरक्षण प्राप्त है, जिससे इनके हौसले बुलंद हैं।


खबर से बौखलाए उपयंत्री; मर्यादा भूले, खुद को पाक-साफ बताने का ड्रामा

पूरा मामला तब गरमाया जब एक सजग आवेदक ने जनपद पंचायत जयसिंहनगर के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) को आवेदन देकर संबंधित उपयंत्रियों के कार्यक्षेत्र में हुए निर्माण कार्यों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की। हैरान करने वाली बात यह है कि एक महीना बीत जाने के बाद भी आवेदन ठंडे बस्ते में पड़ा रहा। इसके बाद आवेदक ने दोबारा स्मरण पत्र (रिमाइंडर) देकर सात दिनों के भीतर कार्रवाई की मांग की, लेकिन नतीजा आज भी शून्य है।

जब इस प्रशासनिक सुस्ती और भ्रष्टाचार की खबरें मीडिया में आईं, तो उपयंत्री मनोज शुक्ला पूरी तरह बौखला गए। अपनी कमियां छुपाने के लिए उन्होंने शिकायतकर्ता के लिए मर्यादा लांघते हुए 'आस्तीन का सांप' जैसी अमर्यादित कहावत का इस्तेमाल कर डाला।


बड़ा सवाल
 

अब सवाल यह उठता है कि यह कहावत असल में किस पर लागू होती है? उस पर—जिसे सरकार ने जनता के पैसे से सही काम कराने की जिम्मेदारी दी और वह उसे निभाने में नाकाम रहा? या उस पर—जो व्यवस्था की कमियों पर उंगली उठा रहा है? 

अगर उपयंत्रियों ने अपने क्षेत्र में पूरी ईमानदारी से काम किया है, तो वे जांच से इतना डर क्यों रहे हैं? 'पब्लिक है, ये सब जानती है।' एक जिम्मेदार सरकारी पद पर बैठे अधिकारी द्वारा ऐसे शब्दों का प्रयोग करना न सिर्फ उनकी मानसिकता, बल्कि जनपद से लेकर जिला पंचायत तक की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक शालीनता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करता है।

पहुंच और पैसे का रौब

उपयंत्रियों द्वारा अपने पहुंच और पैसे का रौब दिखा रहे हैं तभी तो इन पर कार्यवाही करने से अधिकारियों को डर कर सामना करना पड़ रहा है। इनके द्वारा जिस तरह से भ्रष्टाचार को संरक्षण अपने क्षेत्र में दिया जा रहा है कोई भी उच्चाधिकारी कार्यवाही करने से पीछे नहीं हटता। एसडीओ स्वयं जिन्हें उपयंत्रियों की कमान संभालने का जिम्मा दिया गया है पर लग ऐसा रहा है कि उनके द्वारा स्वयं उनके भ्रष्टाचार गतिविधियों पर सहयोग किया जा रहा है सूत्रों की माने तो उपयंत्री मनोज शुक्ला द्वारा बड़ी -बड़ी हस्तियों को अपना रिश्तेदार बताया जा रहा है क्या वों रिश्तेदार इनका सहयोग कर अपना नाम खराब करना चाहेंगे।एक तो उपयंत्री द्वारा भ्रष्टाचार का ढिंढोरा पीटा जाता है वही ऐसे बडें नाम को बदनाम करने की कोशिश की जाती है जो पूर्णता गलत है।

उपयंत्री या ठेकेदार

पुष्ट सूत्रों की माने तो उपयंत्री जिन्हें अपने क्षेत्र अंतर्गत भ्रष्टाचार पर रोक लगाने का कार्य किया जाना चाहिए पर उनके द्वारा स्वयं भ्रष्टाचार को बढ़ावा देकर ठेकेदारी करने का शौक लगा है तभी तों आधें सें ज्यादा क्षेत्र में इनकें स्वयं ठेकेदारी की गई हैं वर्तमान में कुछ ग्राम पंचायत में चल भी रहा है और उनके द्वारा ऐसे क्षेत्रों में कार्य करवाया जाता है जहां हर किसी का पहुंच पाना संभव नहीं है। यही नहीं बल्कि मनोज शुक्ला द्वारा अपने क्षेत्र में ऐसे ऐसे कारनामे करते नजर आ चुके हैं जिसे पूर्व में समाचार पत्रों द्वारा बया किया जा चुका है

आरटीआई (RTI) का मखौल

जयसिंहनगर जनपद में सूचना का अधिकार बना दिखावा भ्रष्टाचार के मामलों को पारदर्शी बनाने और आम जनता को समय पर जानकारी देने के लिए सरकार ने 'सूचना का अधिकार अधिनियम 2005' (RTI) बनाया है। लेकिन जयसिंहनगर जनपद पंचायत में इस कानून का खुलेआम मखौल उड़ाया जा रहा है।

जब दोनों उपयंत्रियों के कार्यक्षेत्र से जुड़ी गड़बड़ियों का सच सामने लाने के लिए आरटीआई के तहत जानकारी मांगी गई, तो उपयंत्री हिमेंद्र पटले ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। वे अपनी कमियों का ठीकरा ग्राम पंचायतों पर फोड़ते नजर आ रहे हैं। अपने बचाव में उनका कहना है कि संबंधित दस्तावेज ग्राम पंचायत में जमा हैं।

जब जानकारी सीधे तौर पर उपयंत्री और उनके कार्यों से संबंधित है, तो उसे उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की है। इस टालमटोल वाले रवैये के बाद अब देखना यह दिलचस्प होगा कि क्या प्रथम अपीलीय अधिकारी हस्तक्षेप करके समय-सीमा के भीतर जानकारी उपलब्ध करा पाते हैं, या फिर रसूखदार उपयंत्रियों के आगे कानून यूं ही बेबस नजर आएगा।

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